छत्तीसगढ़

JANJGIR CHAMPA: दिव्यांग के हक पर डाका! पीएम आवास की पहली किस्त किसी और के खाते में, 5 माह बाद भी प्रशासन मौन

लकवाग्रस्त राम सिंह चौहान बरसात में घर गिरने के बाद भी जर्जर कमरे में रहने को मजबूर

नवागढ़ जनपद पंचायत की लापरवाही या मिलीभगत?

जांजगीर-चांपा | विशेष रिपोर्ट

जिले के नवागढ़ विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सरखों में प्रधानमंत्री आवास योजना के क्रियान्वयन में गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। ग्राम सरखों निवासी राम सिंह चौहान, जो लकवाग्रस्त दिव्यांग हैं और चलने-फिरने में पूर्णतः असमर्थ हैं, के नाम से स्वीकृत पीएम आवास योजना की पहली किस्त किसी अन्य व्यक्ति के बैंक खाते में डाल दी गई।

पीड़ित की पत्नी गनेशी बाई अपने दिव्यांग पति को सहारा देकर बीते पाँच महीनों से नवागढ़ जनपद पंचायत के चक्कर काट रही हैं। जनपद स्तर पर कुछ अधिकारियों द्वारा इसे “तकनीकी गलती” बताया गया और आश्वासन दिया गया कि राशि वापस आ जाएगी, लेकिन पाँच माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद एक भी रुपया उनके खाते में नहीं पहुँचा।

बरसात ने छीनी छत, अब जान का खतरा

इस वर्ष की बरसात में राम सिंह का कच्चा मकान पूरी तरह ढह गया। केवल एक कमरा बचा है, जो पूरी तरह जर्जर है। किसी भी समय हादसा हो सकता है, लेकिन मजबूरी में दिव्यांग दंपति उसी कमरे में रहने को विवश हैं, जहाँ हर रात डर के साए में कटती है।

सिस्टम से टकराते सवाल

  • पीएम आवास की राशि दूसरे खाते में कैसे गई?
  • क्या बिना मिलीभगत के यह संभव है?
  • 5 माह तक राशि वापस न होना लापरवाही है या जानबूझकर देरी?
  • जिम्मेदार अधिकारी अब तक जवाबदेह क्यों नहीं ठहराए गए?
  • क्या दिव्यांग होना ही सबसे बड़ी सजा बन गया है?

सिर्फ गलती नहीं, अधिकारों से खिलवाड़

यह मामला किसी एक परिवार का नहीं, बल्कि गरीब और दिव्यांग के अधिकारों पर सीधा प्रहार है। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजना जनपद स्तर पर सवालों के घेरे में है, जहाँ कमजोर की आवाज दबती दिख रही है।

मांग

  • दोषी अधिकारी/कर्मचारी पर तत्काल कार्रवाई
  • राम सिंह चौहान को पूरी आवास राशि का अविलंब भुगतान
  • जर्जर स्थिति को देखते हुए आपात आवास सहायता
  • जिले में पीएम आवास भुगतान की विशेष जांच

प्रशासनिक पक्ष

इस संबंध में संबंधित जनपद पंचायत अधिकारियों से पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका। 

अगर दिव्यांग को भी अपना हक पाने के लिए घिसटना पड़े, तो यह व्यवस्था आखिर किसके लिए है?

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