राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बस्तर में संबोधन, बोलीं-मैं भी मांझी की बेटी हूं’, आदिवासी संस्कृति पर जताया गर्व

बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी संस्कृति, पारंपरिक न्याय व्यवस्था, शिक्षा, विकास और नक्सलवाद के खिलाफ एकजुटता पर जोर दिया।
जगदलपुर, 23 अक्टूबर 2026। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित मुरिया दरबार में आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक निर्णय प्रणाली की सराहना की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की परंपराएं सामाजिक एकता, न्याय, आपसी सहयोग और सुशासन की महत्वपूर्ण मिसाल हैं। उन्होंने समाज से अपनी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रखने, बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने और नक्सलवाद जैसी चुनौतियों का मिलकर सामना करने का आह्वान किया।

‘मैं भी मांझी की बेटी हूं’, राष्ट्रपति ने साझा किया पारिवारिक जुड़ाव
मुरिया दरबार में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक प्रमुखों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने परिवार और आदिवासी परंपराओं से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि वह स्वयं इसी संस्कृति और परंपरा से आती हैं।

राष्ट्रपति ने बताया कि उनके दादाजी, पिताजी और भाई मांझी की भूमिका निभाते रहे हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा कि वह एक मांझी की बेटी और गांव के मुखिया की बेटी हैं। उनके परिवार के सदस्य आज भले ही उनके बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी संस्कृति और सामाजिक परंपराओं से उनका जुड़ाव आज भी गहरा है।
आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था को बताया उत्कृष्ट
राष्ट्रपति ने कहा कि समय के साथ शासन प्रणालियां और कानून बदलते रहे हैं, लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी पारंपरिक व्यवस्थाओं, सामाजिक नियमों और मान्यताओं को पीढ़ियों से सहेजकर रखा है। यह व्यवस्था समाज में प्रेम, सद्भाव, सुख-शांति और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करती है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में कई सामाजिक और पारिवारिक मामलों पर सामूहिक विचार-विमर्श के माध्यम से निर्णय लेने की परंपरा रही है। लोग मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं, विवाह और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा नृत्य, गीत-संगीत और त्योहारों के माध्यम से अपनी संस्कृति को जीवित रखते हैं।
राष्ट्रपति ने इस विरासत को संरक्षित रखने के लिए समाज के लोगों की सराहना की और कहा कि आने वाली पीढ़ियों तक इन परंपराओं को पहुंचाना आवश्यक है।
मांझी, पीड़ परगना और देश परगना की व्यवस्था का किया उल्लेख
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए मांझी, पीड़ परगना और देश परगना जैसी संस्थाओं के महत्व पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि गांव में परिवारों के बीच विवाद या जमीन-जायदाद से जुड़े मतभेद होने पर पारंपरिक प्रमुख लोगों को एकत्रित कर दोनों पक्षों की बात सुनते थे। आपसी सहमति से समाधान निकालने का प्रयास किया जाता था। गांव स्तर पर समाधान नहीं होने पर मामला पीड़ परगना और आवश्यकता पड़ने पर देश परगना तक पहुंचता था।
राष्ट्रपति के अनुसार, पहले लगभग 50 से 52 गांवों को मिलाकर एक पीड़ की व्यवस्था हुआ करती थी। बड़ी समस्याओं पर निर्णय लेने के लिए समाज के लोग कई दिनों तक बैठक करते और विचार-विमर्श के बाद समाधान तक पहुंचने का प्रयास करते थे। यह परंपरा समाज की एकता, आपसी विश्वास और सामूहिक जिम्मेदारी को दर्शाती है।
संवाद और सहमति से विवाद सुलझाने पर जोर
राष्ट्रपति ने कहा कि आधुनिक न्यायिक व्यवस्था में पुलिस, थाना और न्यायालयों के माध्यम से विवादों का समाधान किया जाता है। कई मामलों में न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने के कारण समय और धन दोनों खर्च होते हैं।
उन्होंने आग्रह किया कि जहां संभव हो और कानून इसकी अनुमति देता हो, वहां आपसी संवाद, सहमति और सामाजिक सहयोग से विवाद सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए। उन्होंने मुरिया दरबार जैसी ऐतिहासिक परंपराओं को बनाए रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
नक्सलवाद के खिलाफ एकजुट रहने का आह्वान
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नक्सलवाद की चुनौती का उल्लेख करते हुए आदिवासी समाज से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि समाज को अपने गांव, अपने भविष्य और अपने हितों के संबंध में सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए।
उन्होंने आदिवासी समाज के संघर्षपूर्ण इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि इस समाज ने अपने अधिकारों, सम्मान और अस्तित्व की रक्षा के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया है। समाज के लोगों को किसी के बहकावे में आने के बजाय जागरूक रहना चाहिए और अशांति फैलाने वाली ताकतों का मिलकर सामना करना चाहिए।
राष्ट्रपति ने कहा कि सामूहिक प्रयासों से कठिन से कठिन चुनौती का सामना किया जा सकता है। एकजुट और मजबूत समाज अपनी समस्याओं का बेहतर तरीके से समाधान कर सकता है।
शिक्षा और विकास के साथ संस्कृति का संरक्षण जरूरी
राष्ट्रपति ने आदिवासी परिवारों से बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की अपील की। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ समाज का आगे बढ़ना जरूरी है। बच्चों को अच्छी शिक्षा, बेहतर अवसर और जीवन में प्रगति करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक शिक्षा और विकास को अपनाने का अर्थ अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान को छोड़ना नहीं है। विकास और सांस्कृतिक संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं।
राष्ट्रपति ने समाज के लोगों से अपनी जड़ों से जुड़े रहने, पारंपरिक संस्थाओं का सम्मान करने और बच्चों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के विकास और कल्याण के लिए सरकार सहयोग कर रही है और आगे भी करती रहेगी।
आध्यात्मिकता और प्रकृति के प्रति आस्था आदिवासी संस्कृति की पहचान
राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज की आध्यात्मिक परंपराओं और प्रकृति के प्रति आस्था को उसकी विशिष्ट पहचान बताया। उन्होंने कहा कि गांवों में ग्राम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना और सामूहिक रूप से सुख-समृद्धि की कामना करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के पर्व-त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के माध्यम भी हैं। सामूहिक नृत्य, गीत-संगीत और उत्सव समाज के लोगों को आपस में जोड़ते हैं।
मुरिया दरबार की ऐतिहासिक परंपरा को जीवित रखने की अपील
राष्ट्रपति ने कहा कि किसी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं और सामूहिक मूल्यों से होती है। मुरिया दरबार जैसी ऐतिहासिक परंपराएं आदिवासी समाज के सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
उन्होंने समाज के लोगों से भाईचारा, प्रेम, सद्भाव और सामाजिक न्याय जैसे मूल्यों को बनाए रखने की अपील की। साथ ही बस्तर के लोगों से मिले स्नेह, सम्मान और आत्मीय स्वागत के लिए आभार व्यक्त किया।
राष्ट्रपति को भेंट की गई काष्ठ कला की कलाकृति
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को काष्ठ कला की कलाकृति स्मृति चिह्न के रूप में भेंट की गई।
इस अवसर पर बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष एवं सांसद महेश कश्यप, उपाध्यक्ष बलराम मांझी, पारंपरिक प्रमुख अर्जुन मांझी, शशिभूषण मांझी और गंगाधर मांझी सहित अनेक जनप्रतिनिधि एवं समाज के प्रमुख उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचन्द्र भंजदेव, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल, वन मंत्री केदार कश्यप, सांसद भोजराज नाग, विधायक किरण सिंह देव, महापौर संजय पाण्डे तथा प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
निष्कर्ष: मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संबोधन आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था, सांस्कृतिक पहचान, शिक्षा और सामाजिक एकता के महत्व पर केंद्रित रहा। उन्होंने विकास के साथ अपनी जड़ों और विरासत को सुरक्षित रखने का संदेश दिया।





