छत्तीसगढ़ में हरी खाद का बढ़ता दायरा: जशपुर में 600 हेक्टेयर में प्रदर्शन, यूरिया पर निर्भरता घटाने की पहल
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में जैविक और टिकाऊ खेती को बढ़ावा, किसानों को हरी खाद अपनाने की अपील

जशपुर, 17 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ में टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में अब किसानों को रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में हरी खाद अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसी कड़ी में जशपुर जिले में इस वर्ष 600 हेक्टेयर क्षेत्र में हरी खाद का प्रदर्शन किया जा रहा है।

कृषि विभाग द्वारा जिले के सभी विकासखंडों में यह पहल लागू की गई है, जिसका उद्देश्य किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए जागरूक करना है। विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे अपने नजदीकी कृषि अधिकारियों से संपर्क कर इस तकनीक को अपनाएं।
क्या है हरी खाद और कैसे होती है उपयोग?
हरी खाद के अंतर्गत ढेंचा, सनई, मूंग, उड़द और बरसीम जैसी फसलों को खेत में उगाया जाता है। इन फसलों को 40 से 50 दिन बाद जुताई कर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके बाद 2 से 3 सप्ताह का अंतर देकर मुख्य फसल की बुवाई की जाती है।
मिट्टी की सेहत के लिए फायदेमंद
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन, पोटाश और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थों का स्तर भी बढ़ता है, जो भूमि की उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करता है। साथ ही, मिट्टी की जलधारण क्षमता बेहतर होती है और जमीन अधिक भुरभुरी बनती है।
यूरिया का बेहतर विकल्प
विशेषज्ञों का मानना है कि हरी खाद अपनाने से रासायनिक उर्वरकों, खासकर यूरिया की जरूरत काफी हद तक कम हो जाती है। इससे किसानों की लागत घटती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
किसानों की आय बढ़ाने में सहायक
हरी खाद एक कम लागत और अधिक लाभ देने वाली तकनीक है। यह न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है, बल्कि फसल उत्पादन को भी बेहतर बनाती है। राज्य सरकार के इस प्रयास से किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और खेती को टिकाऊ बनाने में मदद मिल रही है।





