छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में अफीम का काला खेल: दुर्ग, बलरामपुर के बाद अब रायगढ़ में अवैध खेती का बड़ा खुलासा

रायपुर / छत्तीसगढ़ में अवैध अफीम की खेती अब अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह एक संगठित और सुनियोजित ‘काला खेल’ बनता जा रहा है। दुर्ग से शुरू हुआ यह सिलसिला बलरामपुर होते हुए अब रायगढ़ तक पहुंच गया है—और हर नए खुलासे के साथ यह नेटवर्क और गहराता नजर आ रहा है।

सबसे पहले दुर्ग जिले में इस खेल की परतें खुलीं, जहां पुलगांव क्षेत्र के एक फार्महाउस में 5 एकड़ से ज्यादा जमीन पर अफीम की खेती की जा रही थी। इस अवैध फसल की कीमत करीब 8 करोड़ रुपये आंकी गई। मामले में बाहरी मजदूरों को बुलाकर खेती कराई जा रही थी और राजनीतिक कनेक्शन भी सामने आए, जिसने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया।

इसके बाद बलरामपुर जिले में सीमावर्ती इलाकों से चौंकाने वाले खुलासे हुए। कुसमी के त्रिपुरी गांव में बाहरी लोगों द्वारा आदिवासी जमीन लीज पर लेकर अफीम की खेती की जा रही थी। वहीं कोरंधा थाना क्षेत्र के तुर्रीपानी में करीब 1.47 एकड़ जमीन पर फैली अफीम की फसल से 18 क्विंटल से ज्यादा अफीम जब्त हुई, जिसकी कीमत 2 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई। इस मामले में पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई की।

अब रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में सामने आया मामला इस कड़ी की ताजा कड़ी है, जहां तरबूज की खेती के बीच करीब एक एकड़ से अधिक जमीन पर अफीम उगाई जा रही थी। यह खुलासा ग्रामीणों की सतर्कता से हुआ, जिसके बाद पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू की गई।

तीनों जिलों के इन मामलों को जोड़कर देखें तो एक खतरनाक पैटर्न सामने आता है—दूर-दराज और सीमावर्ती इलाके, खेतों के बीच छिपाकर की जा रही खेती, बाहरी लोगों की संलिप्तता और लंबे समय तक स्थानीय स्तर पर इसकी भनक तक न लगना। यह संकेत साफ है कि यह महज संयोग नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क की साजिश हो सकती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में अफीम की खेती बिना किसी रुकावट के कैसे जारी रहती है? क्या निगरानी तंत्र कमजोर है, या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत की भी भूमिका है? लगातार तीन जिलों में इस तरह के मामलों का सामने आना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

अवैध अफीम की खेती केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि समाज के लिए एक बड़ा खतरा है। इससे नशे का कारोबार बढ़ता है, जिसका सीधा असर युवाओं के भविष्य पर पड़ता है। यह स्थिति किसी भी विकसित होते राज्य के लिए चिंता का विषय है।

अब जरूरत है सख्त और स्मार्ट कार्रवाई की। सीमावर्ती और ग्रामीण इलाकों में निगरानी बढ़ाने, आधुनिक तकनीकों का उपयोग करने और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है। साथ ही, ग्रामीणों को जागरूक कर उन्हें इस लड़ाई में सहभागी बनाना भी उतना ही जरूरी है।

दुर्ग, बलरामपुर और रायगढ़ के ये मामले सिर्फ खबर नहीं, बल्कि चेतावनी हैं—अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह ‘काला खेल’ पूरे प्रदेश में और गहराई तक फैल सकता है।

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